बुद्धि के आगे सब भागे हिंदी कहानी।

बात बहुत पुरानी है। एक राजा की नगरी में एक हाथी और एक शेर ने प्रजा का जीना दुभर कर दिया था। राजा सब प्रयास कर हार गया, पर इन दोनों जीवो को नहीं मार सका। आखिर राजा ने डोंडी पिटवा दी कि जो इन दोनों जीवों को मार देगा, उसे बहुत इनाम दिया जाएगा।


एक दिन अपने जीवन से निराश एक परदेशी इस नगर में आया। उसका इरादा आत्महत्या करने का था। इसलिए वह चावल में जहर मिलाकर खाने की तैयारी कर रहा था। उसे जोर की प्यास लगी तो चावल की पोटली पेड़ के नीचे रखकर वह पानी पीने चला गया। पानी पीकर लौटा तो देखा वहां एक हाथी मरा पड़ा है। वह उस परदेशी के जहर मिले चावल खा गया था।

राजा को हाथी के मरने का समाचार मिला तो वह बहुत खुश हुआ। राजा के आदमियों ने परदेशी को राजा के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। राजा ने घोषणा के अनुसार उसे इनाम दिये और शेर को भी मारने का हुक्म दिया। 

परदेशी संकट में पड़ गया। वह सोच रहा था कि हाथी तो संयोग से मर गया पर शेर को मारना तो बहुत टेढ़ी खीर है। फिर यह सोचकर कि उसे मरना तो है ही, वह शेर को मारने की योजना बनाने लगा। 

एक दिन बांस और कई रस्से आदि लेकर जंगल में गया और एक बड़े पेड़ पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद वह जोर-जोर से चीखने लगा। भय के मारे जंगल के पक्षी भी उसके साथ चीखने लगे। 

शेर उस पेड़ के नीचे आया और उसने उस परदेशी से पूछा, ‘भाई, तुम इन पक्षियों को क्या सिखा रहे हो?’ 

‘संगीत सिखा रहा हूं।’ परदेशी ने उत्तर दिया। 
‘मुझे भी संगीत सिखने का शौक है। सिखा दोगे?’ शेर ने पूछा।

‘सिखा तो दूंगा, पर तुम ठहरे शेर, पता नहीं कब तुम मुझे खा जाओ।’ परदेशी ने कहा। 

‘नहीं, नहीं,। ऐसा नहीं होगा। तुम मुझ पर विश्वास कर सकते हो।’ शेर ने विश्वास दिलाते हुए कहा।

‘अगर तुम संगीत सिखना चाहते हो तो मेरी एक शर्त है।’ परदेशी ने कहा। 

‘क्या?’ शेर ने पूछा। ‘संगीत सिखाते वक्त मैं तुम्हारे पैर बांध देना चाहता हूं।’ परदेशी बोला। 

‘ठीक है।’ शेर ने इजाजत दे दी। परदेशी ने पेड़ से उतर कर शेर के पांव बांध दिए, फिर बांस से उसकी पिटाई शुरू कर दी।

इतनी पिटाई हो गई की जब शेर से मार सहन नहीं हुई तो बोला, ‘बस करो! इतना ही बहुत है।’ 

पर परदेशी तो तब तक मार कर संगीत सिखाता रहा, जब तक शेर मर नहीं गया।

उसने शेर को ले जाकर राजा के सामने पटक दिया और भारी इनाम पाया।

फिर राजा ने परदेसी से लड़ने के लिए एक बहादुर आदमी को बुलवाया। लड़ाई से पहली रात दोनों को एक ही जगह ठहराया गया।

परदेशी ने उस शक्तिशाली आदमी से कहा, ‘भाई मुझे तुम पर दया आती है। तुम्हारा इतना जल्दी मरना ठीक नहीं है। मैं हाथी और शेर को तो मार चुका हूं अब... तुम।’ 

परदेशी की बात सुनकर वह बहादुर कांप उठा। वह रातों-रात चुपचाप भाग गया।

अगले दिन परदेशी को राजा ने खूब इनाम दिया। और वह परदेशी जो अपने जीवन से निराश हो गया था, सुख से रहने लगा।

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