चतुर नंदू ऊंट की कहानी।

सुंदरवन में भालू, बंदर, ऊंट सहित कई जानवर रहते थे। संकट की घड़ी में सब मिलकर मुसीबत का सामना करते। पर उन सब की खुशियों पर जैसे कुछ समय से ग्रहण लग गया था। क्योंकि पास ही स्थित दुर्जन वन से पाँच शेर सुंदरवन में आ गए थे। शांत सुंदरवन में तो मानो हड़कंप मच गया। सभी पशु-पक्षी इतने डरे रहते थे।


सुंदरवन के राजा शेरसिंह शांत और स्तब्ध थे। उनके प्रमुख योद्धा बाघ को शेरों ने मार डाला था। सभी पशु-पक्षी उनके दरबार में आतंक से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना कर रहे थे।

अंततः शेरसिंह ने चुप्पी तोड़ी। ‘हम सबको मिलकर उनके साथ युद्ध करना होगा।’ ‘पर महाराज वह बहुत शक्तिशाली और बलवान हैं। हमारी सेना के श्रेष्ठ योद्धा उनके हाथों मारे गए हैं। व्यर्थ में उनके साथ युद्ध करके अपनी जान गंवाने का कोई अर्थ नहीं है।’ वयोवृद्ध मंत्री रामू जिराफ ने कहा।

‘तो फिर हमें क्या करना होगा।’ शेरसिंह ने चिंतित होते हुए पूछा। ‘महाराज इस समस्या से बचने का एक ही उपाय है, हमें सुंदरवन उन्हें सौंप देना चाहिए।’ महामंत्री कालू भालू बोला। 

‘नहीं कालू। जिस प्रजा को मैंने पुत्र की तरह पाला है, उस प्रजा को छोड़कर मैं कायरों की तरह भाग जाने की बात स्वप्न में भी नहीं सोच सकता। भले ही मैं वृद्ध हो चुका हूं, पर सेना का नेतृत्व करने की क्षमता अभी शेष है। तुम बची हुई सेना तैयार करो।’ 

ऐसा कहकर शेरसिंह उठ खड़े हुए। ‘महाराज! मैं शेरों से युद्ध करना चाहता हूं।’ यह आवाज नंदू ऊंट की थी।

‘युद्ध और तुम! कहीं पागल तो नहीं हो गए हो, तुम्हारे पास न तो पैन नाखून है, ना ही तुम ताकतवर हो। जिन शेरों ने सेनापति बाघ को मार डाला उनका तुम क्या बिगाड़ सकते हो? शेरसिंह की आवाज में विस्मय था। ‘युद्ध ताकत से ही नहीं बुद्धि से लड़ा जाता है। 

मैं सुंदरवन की रक्षा के लिए स्वयं को आजमाना चाहता हूं। मुझे अनुमति दीजिए’ नंदू की आवाज में आत्मविश्वास था।
‘ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा, शेर सिंह ने कहा। 

नंदू धीमे कदमों से उस स्थान की तरफ बढ़ रहा था। जहां वे पांचों शेर आतंक मजाकर विश्राम कर रहे थे। नंदू को देखते ही उनमें से एक शेर ने हंसकर कहा, मौत की तरफ क्यों चला आ रहा है मूर्ख।’ ‘आपकी वीरता से प्रभावित होकर यह तुच्छ शरीर आपको भेंट करने आया हूं। 

कायर राजा के अधीन जीवन से कहीं बेहतर है कि आप जैसे वीरों के हाथों मृत्यु हो।’ 
नंदू ने अपनी बात कही। ‘तो तेरी इच्छा पूरी कर देते हैं।’ कहते हुए वह शेर आगे बढ़ा। ‘पर मरने से पहले मेरी एक इच्छा है कि मेरा शिकार आप में से वही करे जो सबसे वीर हो, साहसी हो’ नंदू ने अपनी चाल चल दी थी। 

‘रुको! इसका शिकार मैं ही करूंगा।’ कहते हुए एक शेर आगे बढ़ा। ‘शिकार करने का अधिकार मुझे है, क्योंकि मैं ही सबसे वीर हूं।’ कहते हुए तीसरा शेर आगे बढ़ा। ‘बाघ को मैंने मारा था। इसलिए मैं ही तुम सबसे वीर हूं।’ एक अन्य शेर ने कहा। 

थोड़ी ही देर में उन शेरों में बहस तेज होने लगी। आखिर में यह युद्ध में बदल गई। पांचों शेर आपस में लड़कर अपनी अंतिम सांसें गिन रहे थे। 

नंदू अपनी विजय पर मुस्कुराया रहा था। पीछे खड़े मुस्कुरा रहे थे शेरसिंह और मंत्री, क्योंकि उन्हें सिंहासन का सच्चा उत्तराधिकारी मिल गया था।

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